Saturday, March 28, 2015

पत्थर तर जाए जिसे मिले राम का नाम
मानव साधन मात्र है करता धरता राम
करता धरता राम व्यर्थ मानव इतराता
माटी का तन श्वास थमे माटी बन जाता
होता है  शौकीन वही  जो  चाहे  ईश्वर
कहीं डूबती नाँव कहीं तर जाता पत्थर

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  रचनाकार @    कवि सुजीत शौकीन
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Thursday, March 26, 2015

बर्फ गिरी थी जब फसलों पर,ठाँव तुम्हारे ठण्डे थे
माँग रहे थे हक दिल्ली में, ताँव तुम्हारे ठण्डे थे
अन्नदाता का ध्यान नहीं है,सिडनी पर थी आँख गड़ी
जब कदमों से माँगी हरकत, पाँव तुम्हारे ठण्डे थे
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Monday, March 23, 2015

वन्दन  हे  माँ  भारती  जन्मे  ऐसे पूत
फाँसी पर हँसकर चढ़े आजादी के दूत
आजादी के  दूत राष्ट्र  के  सच्चे नन्दन
गूंज उठा जय हिन्द नाद थर्राया लन्दन
तीन  तिलंगे  वीर  काटने  आए  बन्धन
भगत सिंह सुखदेव राजगुरु शतशत वन्दन

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Sunday, March 15, 2015

माखन मोहन मालती रोया राम गुलाम
सबनें  लूटे  हम  सदा  तू भी  लूटे राम
तू भी लूटे राम,फसल पर बर्फ गिराता
गोवर्धन को कृष्ण अभी क्यों नहीं उठाता
अनुशासन को तोड,चैत्र में लाया सावन
जब हम देंगे बर्फ,समझना तू भी माखन

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Thursday, March 5, 2015

पिचकारी है प्रेम की, भरो खुशी का रंग।
होली का त्यौहार है, दिल में धरो उमंग।।

06/03/2015
@सुजीत शौकीन
होली की शुभकामनाएं---------------------
दिल्ली मेरठ  हाथरस  होली  का हुड़दंग
सुलफा गांजा सोमरस कहीं घोटकर भंग
कहीं  घोटकर भंग पियेंगे भर भर कुल्हड़
होली का त्यौहार कहें  या केवल  हुल्लड़
मूर्खों का  त्यौहार  करो मत बातें सिल्ली
खुशी  मनाओ  यार रहो मेरठ या दिल्ली

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