एक अलिखित कथा का पटाक्षेप..............
सब की इच्छाओं का बोझ
उठाए फिरता है अनवरत।
अपनी सभी चेष्टाओं को इन्हीं
इच्छाओं की धुरी पर बांध
लिया है उसने।
हर सुबह एक स्थापित नियम से
शुरू होती है उस की, और रात तक
सभी कुछ स्थाई है स्थापित है।
यहाँ तक की नींद पर भी परिवार के
सपनों का स्थाई अधिकार है।
दो समय का खाना, दो चाय, दो या तीन
बोतल पानी और कुछ गृहस्थी के
आवश्यक उपक्रम उसे नियमित उपलब्ध हैं।
कितना यन्त्रवत् है जीवन उस का।
वो इस यन्त्रवत् जीवन की यन्त्रणा पर
एक कथा लिखना चाहता है।
फिर ये सोचकर रुक जाता है कि क्या इस
कथानक को लिख कर स्वयम् भी पढ़ पाएगा।
या ये क्रांति उस से उस की सुविधाएं छीन तो न लेगी------ जैसे..... दो समय का खाना,
दो चाय,
दो या तीन बोतल पानी,
और कुछ गृहस्थी के आवश्यक उपक्रम जो उसे नियमित उपलब्ध हैं????
11/07/2017
रचनाकार © सुजीत शौक़ीन
सब की इच्छाओं का बोझ
उठाए फिरता है अनवरत।
अपनी सभी चेष्टाओं को इन्हीं
इच्छाओं की धुरी पर बांध
लिया है उसने।
हर सुबह एक स्थापित नियम से
शुरू होती है उस की, और रात तक
सभी कुछ स्थाई है स्थापित है।
यहाँ तक की नींद पर भी परिवार के
सपनों का स्थाई अधिकार है।
दो समय का खाना, दो चाय, दो या तीन
बोतल पानी और कुछ गृहस्थी के
आवश्यक उपक्रम उसे नियमित उपलब्ध हैं।
कितना यन्त्रवत् है जीवन उस का।
वो इस यन्त्रवत् जीवन की यन्त्रणा पर
एक कथा लिखना चाहता है।
फिर ये सोचकर रुक जाता है कि क्या इस
कथानक को लिख कर स्वयम् भी पढ़ पाएगा।
या ये क्रांति उस से उस की सुविधाएं छीन तो न लेगी------ जैसे..... दो समय का खाना,
दो चाय,
दो या तीन बोतल पानी,
और कुछ गृहस्थी के आवश्यक उपक्रम जो उसे नियमित उपलब्ध हैं????
11/07/2017
रचनाकार © सुजीत शौक़ीन