डूबते जहाज में जी,जिसने भी छेद किये,
मौका पाके वही चूहे, देखे गये कूदते।
देखे गये कूदते वो, ड़ाल ड़ाल पात पात,
जो भी मिले खाने से वो,कभी नहीं चूकते।
कभी नहीं चूकते वो,माल पुआ खोजने में,
ढूँढ उसे लेते सदा , सूंघते वो घूमते।
घूमते हैं जिस घर, कर देते जर जर,
जहाज भी चूहों ही के, छेदने से डूबते।
19/01/2015(सांगोपांग सिंहावलोकन)
सर्वाधिकार सुरक्षित
रचनाकार @ कवि सुजीत शौकीन
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देखे गये कूदते वो, ड़ाल ड़ाल पात पात,
जो भी मिले खाने से वो,कभी नहीं चूकते।
कभी नहीं चूकते वो,माल पुआ खोजने में,
ढूँढ उसे लेते सदा , सूंघते वो घूमते।
घूमते हैं जिस घर, कर देते जर जर,
जहाज भी चूहों ही के, छेदने से डूबते।
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