Saturday, April 25, 2015

आज काँपे सभी रेत के वो थड़े,
बिल्डरों ने यहाँ जो किए हैं खड़े।

काठमांडू हिला साथ दिल्ली हिली,
हाँ हिले वो नहीं लोभ में जो पड़े।

घूसखोरी बनी पाँव की बेडियाँ,
कौन है जो यहाँ दोषियों से लड़े।

राम मेरे न भूकम्प लाना यहाँ,
लोग आकाश में ठाँव लेके चढ़े।

(25/04/2015)सवैया
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  रचनाकार  @   कवि सुजीत शौकीन
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Thursday, April 16, 2015

घटते घटते हाथ के~~~ताव हुए हैं अल्प
जितने तिकड़मबाज हैं खोजें आज विकल्प
खोजें आज विकल्प चलाकर यादव मन्तर
जनता  दलदल मेल कहीं यादव योगेन्दर
 यादव  फिर तैयार  सियासत रटते रटते
जैसे  बढ़ता  दाद  अचानक  घटते  घटते

(16/04/2015)सर्वाधिकार सुरक्षित
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Tuesday, April 7, 2015

दुनिया जम्बू द्वीप का,कहती थी अभिमान
देखो अब  किस हाल में देता अपनी जान
देता अपनी जान ठगा जब खुद को पाता
लुटता यहाँ किसान बिचौला माल बनाता
मरता  है  शौक़ीन कहीं पर मरता बुधिया
मुठ्ठी भर अनुदान दिलासा देती दुनिया

(08/04/2015)सर्वाधिकार सुरक्षित
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Saturday, April 4, 2015

मनुष्य काम क्रोध लोभ मोह बंध काट दे
सुगन्ध बाँट विश्व के अपथ्य मार्ग पाट दे
समीर वृद्धि की बहे अबाध ठाटबाट दे
महाबली किसान को खुले हिये कपाट दे

(04/04/2015)     पंचचामर छंद
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  रचनाकार @    कवि सुजीत शौकीन