आज काँपे सभी रेत के वो थड़े,
बिल्डरों ने यहाँ जो किए हैं खड़े।
काठमांडू हिला साथ दिल्ली हिली,
हाँ हिले वो नहीं लोभ में जो पड़े।
घूसखोरी बनी पाँव की बेडियाँ,
कौन है जो यहाँ दोषियों से लड़े।
राम मेरे न भूकम्प लाना यहाँ,
लोग आकाश में ठाँव लेके चढ़े।
(25/04/2015)सवैया
काव्यमित्र में प्रस्तुत सर्वाधिकार सुरक्षित
रचनाकार @ कवि सुजीत शौकीन
09811783749
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काठमांडू हिला साथ दिल्ली हिली,
हाँ हिले वो नहीं लोभ में जो पड़े।
घूसखोरी बनी पाँव की बेडियाँ,
कौन है जो यहाँ दोषियों से लड़े।
राम मेरे न भूकम्प लाना यहाँ,
लोग आकाश में ठाँव लेके चढ़े।
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