Friday, April 22, 2016

अतुलित बलधारी सतोगुण ब्रह्मचारी,
रुद्र के हैं अवतारी  जय  हनुमान जी।।

वानर की जाति देह मानव की धार आए,
भक्त रघुवीर के वो ज्ञान की हैं खान जी।।

कोस चार सौ वो हिंद सागर को लाँघ गए,
कौतुक से मार आए रावण का मान जी।।

कलियुग में उन्हीं का बल विद्यमान रहे,
दिया था ये राम जी ने उन्हें वरदान जी।।

सर्वाधिकार सुरक्षित 🔐 22/04/2016
 रचनाकार @    कवि सुजीत शौकीन
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