Saturday, May 12, 2018

अपना भी नाम दिल-जलों में हो गया शुमार
दिल में  उठा के रख  लिए हैं हमनें भी शरार

सजदे में सर को रख दिया मक़्तल में हमनें आज
अब कर रहे हैं अपने ही क़ातिल का इंतिज़ार
©सुजीत शौक़ीन
اپنا  بھی  نام  دل جلوں  میں ہو گیا شمار
دل میں اُٹھا کے رکھ لئے ہیں ہمنے بھی شرار

سجدے میں سرکو رکھ دیا مقتل میں ہمنے آج
اب  کر  رہے  ہیں  اپنے  ہی  قابل کا انتظار
©سُجیت شوقین
सर्वाधिकार सुरक्षित 🔐12/05/2018
©कवि सुजीत शौक़ीन 09811783749
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Saturday, May 5, 2018

बोतल  खुली चुनाव की,निकला बाहर जिन्न
वोटर के  मस्तिष्क पर,करे  धिनक  ता धिन्न
करे धिनक ता धिन्न,धिनक ता धिनधिन तारा
जनता  खो  कर  होश, बनी सत्ता  का चारा
कहता  है  शौक़ीन,खुले  गलियों  में  होटल
बस्ती  का  हर  वोट, दबोचे  फिरता  बोतल

सर्वाधिकार सुरक्षित 🔐05/05/2018
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Thursday, November 9, 2017

काटे  तो  महंगा  पडे,घाटा सहे किसान
फूंके अगर पुराल को,दुश्मन कहे जहान
दुश्मन कहे जहान,प्रदूषण पहुंचे दिल्ली
जहाँ  दलों  के लोग,खेलते चूहा बिल्ली
नेता  तो  शौक़ीन, सभी हैं कद के नाटे
अब केवल भगवान्,कष्ट दिल्ली का काटे

रचनाकार
©कवि सुजीत शौक़ीन 09/11/2017




Wednesday, August 9, 2017

#अहंकारी या वास्तविक# @सुजीत शौक़ीन#
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   कुछ हुनरमंद लोगों का व्यक्तित्व अपने हुनर की रौ में बर्फ जैसा ठोस हो जाता है। मुझे ऐसे लोगों से संवाद बनाने में बहुत परेशानी महसूस होती है इसलिए मैं ऐसे लोगों से आमतौर पर दूरी बनाए रखता हूँ।
   पता नहीं ये मेरा अहंकार है या अहंकार का प्रतिकार?
    क्योंकि मेरा ये दृष्टिकोण हुनरमंद लोगों के लिए है,इसलिए कहीं न कहीं मैं अपने इस स्वभाव से असहमत भी हूँ और मुझे लगता है कि ऐसे लोगों की बर्फ पिघलाई जाए तो बहुत ही निर्मल जल की प्राप्ति संभव है।
    लेकिन जिन लोगों में कोई किसी प्रकार का हुनर भी नहीं है और उनका आचरण सर्वथा निज हितों के अनुसार संचालित होता है ऐसे लोगों के साथ अपने प्रतिकारात्मक अहंकार से मुझे कभी कोई असहमति नहीं होती।मुझे लगता है ऐसे गदले जल की बर्फ जमी ही रहे तो अच्छी, हालांकि अपने इस स्वभाव से मुझे हानि उठानी पड़ती है।
    पता नहीं मैं कैसा हूँ अहंकारी या वास्तविक!
@सुजीत शौक़ीन
सर्वाधिकार सुरक्षित 🔐10/08/2017
 रचनाकार @    कवि सुजीत शौक़ीन
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Tuesday, July 11, 2017

एक अलिखित कथा का पटाक्षेप..............

सब की इच्छाओं का बोझ
उठाए फिरता है अनवरत।
अपनी सभी चेष्टाओं को इन्हीं
इच्छाओं की धुरी पर बांध
लिया है उसने।
    हर सुबह एक स्थापित नियम से
शुरू होती है उस की, और रात तक
सभी कुछ स्थाई है स्थापित है।
 यहाँ तक की नींद पर भी परिवार के
सपनों का स्थाई अधिकार है।
   दो समय का खाना, दो चाय, दो या तीन
बोतल पानी और कुछ गृहस्थी के
आवश्यक उपक्रम उसे नियमित उपलब्ध हैं।

        कितना यन्त्रवत् है जीवन उस का।
वो इस यन्त्रवत् जीवन की यन्त्रणा पर
एक कथा लिखना चाहता है।
        फिर ये सोचकर रुक जाता है कि क्या इस
कथानक को लिख कर स्वयम् भी पढ़ पाएगा।
      या ये क्रांति उस से उस की सुविधाएं छीन तो न लेगी------ जैसे..... दो समय का खाना,
दो चाय,
दो या तीन बोतल पानी,
और कुछ गृहस्थी के आवश्यक उपक्रम जो उसे नियमित उपलब्ध हैं????
11/07/2017
रचनाकार © सुजीत शौक़ीन

Monday, June 5, 2017

छप्पन जी के सामने,नहीं पड़ी जब पार
चौबे  जी  पढ़ने  लगे,गीता  जी का सार
गीता जी का सार,भगत को मोक्ष दिलाता
अक्सर पढते लोग,समय जब अंतिम आता
इस विधि में शौक़ीन,अभी हो घोर अकिंचन
श्लोक सात सौ बाँच,चुका है अपना छप्पन

©सुजीत शौक़ीन
05/06/2017








Sunday, March 19, 2017

भोगी गठरी बाँध लें,अब न चलेंगे भोग।
अब  सत्ता  के वास्ते,लेना होगा जोग।।

©कवि सुजीत शौक़ीन
19/03/2017