दिल पे बोझ बहुत हैं भाई,क्या क्या दिल पे झेलूँ।
कैसे अपने इस जीवन की,छकडा गाड़ी ठेलूँ।।
छटे महीने बढ़ता डी ए,रोज बढे महंगाई।
स्मार्ट फोन संग दोनों बच्चे,माँगे वाई-फाई।।
बीवी की बोली बार्डर पर,ज्यों चलती हों गोली।
वेतनभोगी हम लोगों की,हालत पतली हो ली।।
पै कमीशन फँसा खड़ा है,मोदी जी हिलवा दो।
पाँच लाख तो कमसे कम तुम,एरियर भी दिलवा दो।।
बीवी को दूँ एल ई डी और,खुदभी गाड़ी ले लूँ।
दिल पे बोझ बहुत हैं भाई,,,,,,,, (1)
सर्वाधिकार सुरक्षित 🔐 13/05/2016
रचनाकार @ कवि सुजीत शौकीन
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छटे महीने बढ़ता डी ए,रोज बढे महंगाई।
स्मार्ट फोन संग दोनों बच्चे,माँगे वाई-फाई।।
बीवी की बोली बार्डर पर,ज्यों चलती हों गोली।
वेतनभोगी हम लोगों की,हालत पतली हो ली।।
पै कमीशन फँसा खड़ा है,मोदी जी हिलवा दो।
पाँच लाख तो कमसे कम तुम,एरियर भी दिलवा दो।।
बीवी को दूँ एल ई डी और,खुदभी गाड़ी ले लूँ।
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