Monday, June 30, 2014

आंखें चार,जो हुई उनसे,हम चारों खाने चित हो गए।
पैमाने सब लगे झूमने,और मयखाने चित हो गए।
छोडो यार शराब को,करो सलाम,नशीले यार को,,
मुस्कुराने से जिसके,मयकश,दीवाने चित हो गए।
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Friday, June 27, 2014

मेरी अपनी सोच,और मेरा अपना अंदाज,,
मेरी अपनी चोट,और मेरा अपना इलाज।
मेरी मर्जी,उडूं इसमें,या बस निहारता रहूँ,,
आकाश मेरा अपना,मेरा अपना परवाज़।
27/06/2014
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Tuesday, June 24, 2014

हाँ मैं हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।


नश्वर नगर का,मैं वासिन्दा हूँ,,
    
हाँ मैं हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।

दिल है जो,कुलांचे,भर रहा है,,
पर भीतर कुछ, मर रहा है।
लगता है वैसे,भला चंगा हूँ,,
फिर भी,पर क्या,मैं जिन्दा हूँ।
वासनाओं का ही,मैं पतंगा हूँ,,
    
हाँ मैं हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।

पूजा करके वर,प्रभु से मांगा,,
हसरतों के बस,रथ को हांका।
कर्म रहित रह,भाग्य तलाशा,,
भटक रहा,कर्म वन में प्यासा।
कभी लगता मैं,भिख मंगा हूँ,,
    
हाँ मैं हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।

गर जिन्दा हूँ तो,जिन्दगी कहाँ है,,
हंसी ढिढोली वो,दिल्लगी कहाँ है।
लगता है जैसे,जिन्दादिल नहीं है,,
पथ बंजर कुछ,हासिल नहीं है।
रंग विहीन हूँ,मैं बेरंगा हूँ,,
    
हाँ मैं हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।

शब्द नहीं और,कवि बन बैठा,,
खुद से खुद की,छवि बन बैठा।
शिल्प नहीं बस,दिल को गाया,,
वजन ना तोला, छन्द बनाया।
बडे कवियों की,मैं चिन्ता हूँ,,
 
फिर भी हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।

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Sunday, June 22, 2014


एक कविता-एक द्वन्द्व-मानव तनमन का
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कभी धूप है तो कभी छांव है,,
ये तन एक रूह का गांव है।
जगाता भाव कभी अनुरक्ति का,,
खाता ये ताव,कभी उलब्धि का।
सब कुछ,कह जाता कैसा,,
तिलिस्म,ये अभिव्यक्ति का।
अद्भुत शब्द,संवाद करे,,
कैसे जिस्म,व्यक्ति से व्यक्ति का।
तन चूका,पर मन अधूरा,,
अभिलाषा ने,स्वतन को घूरा।
स्व स्निग्ध है,कामासक्त है,,
प्रणय बिखरा है चुराचुरा।
संयम पुकारे,मन से तन,,
ये स्थूल धरा है,नहीं स्वपन।
माने कैसे,पर मानव मन,,
इसको करना,संवाद सृजन।
अनुरागी,तनमन मस्ती का,,
मानव जन्तु,है बस्ती का।
सब जीवो में,श्रेष्ठ प्राणी,,
मतवाला है,मद शक्ति का।
सब कुछ,कह जाता कैसा,,
तिलिस्म,ये अभिव्यक्ति का।
अद्भुत शब्द संवाद करे,,
कैसे जिस्म व्यक्ति से व्यक्ति का।
22/06/2014    1750 HRS
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Saturday, June 21, 2014

शहर गर हसीन है,बंदुक से डर नहीं,,
बचना गोलियों से,जो आंखों से निकलती है।
20/06/2014
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बुलंदियों से ये दुनिया,हसीन दिखती है,,
मगर दिखती है,जिसे जमीन दिखती है।

परवाज के परींदे,नजर ए ज़हन रखना,,
आसमां से तो,हर शै ही,अजीम दिखती है।

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Friday, June 20, 2014

दोस्तो दो लाईनों में पूरी बात,
कह पाया हूँ,तो दाद चाहूँगा।
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हैरत नहीं,जब नेताओं की बात पर,,
मजहबी भांजता(अलापता) है सुर।।
चिंता होती मगर,गधों के पांव बैठकर,,
जब कवि चाटता है खुर।।
20/06/2014
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Wednesday, June 18, 2014

जलवा क्या देखा,करार मांग बैठे,,
लिफ्ट मिलते ही,कार मांग बैठे।
ये क्या कर डाला,बिना हाल पूछे,,
       तुम सीधे सीधे,क्यों प्यार मांग बैठे।
पहले की उनकी,ठीक बडाई होती,,
फिर धीरे धीरे,पींग बढाई होती।
मिलने जुलने का,दाव चलाते उनपे,,
फिर धीरे से अर्जी,सरकाई होती।
नाहक चप्पल की मार मांग बैठे,,
     तुम सीधे सीधे,क्यों प्यार मांग बैठे।
18/06/2014
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Tuesday, June 17, 2014

छोटी बहर में एक नज्म
दोस्तों को नजर कर रहा हूँ।
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अनछुआ,अहसास ले लो।
धरती सारी,आकाश ले लो।

क्या करुंगा,मैं समंदर,,
मुझसे मेरी,प्यास ले लो।

शब्द शब्द,तेरे लिए है,,
विरह का,उपन्यास ले लो।

कंढी माला,छिनलो सब,,
वापस अब,सन्यास ले लो।

देखो भटके,कृष्ण तुम्हारा,,
राधा बनकर,रास ले लो।

तुम जीत ले लो,हार दे दो,,
लेकिन प्रेम,प्रवाह ले लो।

प्रदिप्त है पर,जल रहा है,,
'
शौकीन'का,संताप ले लो।

(17/06/2014)  09811783749
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Monday, June 16, 2014

दिल में हिन्दू,कभी मुस्लमान रखता हूँ,,
भारतीय हूँ यारो,यही पहचान रखता हूँ।
हिन्दू हूँ और,पूजता हूँ बुते,मादरे हिन्द,,
गर मुस्लमान,सच्चा हूँ तो,वतन का ईमान रखता हूँ।
लेकिन मैं हिन्दू हूँ,ना मुस्लमान,मैं हूँ हिन्दुस्तान,,
और पनाह में सियासी,बेईमान रखता हूँ।
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Sunday, June 15, 2014

पितृ दिवस पर आज अपनी एक पुरानी कविता की चन्द पंक्तियां याद आ रही हैं।-----------------------------------------
बरगद की छांव में,जब अकुलाते हैं,,
बाग फूलों का,तब अलग,खिलाया जाता है।
दिल रखवाले का,मगर तब रोता है,,
जब बरगद,गमलों में,सजाया जाता है।
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Friday, June 13, 2014

सम्मान दे नारी को,, है मर्द की पहचान यही।
पहचान दे नारी को,, है मर्द का सम्मान यही।
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Thursday, June 12, 2014

गऊ माता

-----------गऊ माता------------
तुमपे ,गऊ माता,,किसीको भी,तरस नही आता।
क्यों रूठे हैं,पूत तेरे,,हमको माँ,समझ नहीं आता।
तुझको पूजा,रघुकुल ने,,
माता माना,गोकुल ने।
रघुकुल कीभी,रीत गई,,
भुला दिया माँ,गोकुल ने।
सो गए क्या,दानी दाता,,क्यूं बादल,बरस नही पाता।
क्यों रूठे हैं,पूत तेरे,,हमको माँ,समझ नहीं आता।
क्यूं सडकों पे,फिरती तू,,
कूड़ा कचरा,चरती तू।
ये क्यों दशा,हुई तेरी,,
बिन आई क्यूं,मरती तू।
कहाँ गए वो,कृष्ण सुदामा,,गोवर्धन क्यूं,दरक नहीं जाता।
क्यों रूठे हैं,पूत तेरे,,हमको माँ,समझ नहीं आता।
जननी माता,गऊ माता,,
परम पूनीत,धरती माता,,इनका वंदन,मोक्ष दिलाता।।।
कहाँ गए वो, ज्ञानी ज्ञाता,,
भारत माँ के,भाग्य विधाता,,जो कहते थे,गऊ है माता।।।
गोकशी जो,रोक ना पाता,,क्यूं तख्ता वो,पलट नहीं जाता।
क्यों रूठे हैं,पूत तेरे,,हमको माँ,समझ नहीं आता।
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