Sunday, June 22, 2014


एक कविता-एक द्वन्द्व-मानव तनमन का
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कभी धूप है तो कभी छांव है,,
ये तन एक रूह का गांव है।
जगाता भाव कभी अनुरक्ति का,,
खाता ये ताव,कभी उलब्धि का।
सब कुछ,कह जाता कैसा,,
तिलिस्म,ये अभिव्यक्ति का।
अद्भुत शब्द,संवाद करे,,
कैसे जिस्म,व्यक्ति से व्यक्ति का।
तन चूका,पर मन अधूरा,,
अभिलाषा ने,स्वतन को घूरा।
स्व स्निग्ध है,कामासक्त है,,
प्रणय बिखरा है चुराचुरा।
संयम पुकारे,मन से तन,,
ये स्थूल धरा है,नहीं स्वपन।
माने कैसे,पर मानव मन,,
इसको करना,संवाद सृजन।
अनुरागी,तनमन मस्ती का,,
मानव जन्तु,है बस्ती का।
सब जीवो में,श्रेष्ठ प्राणी,,
मतवाला है,मद शक्ति का।
सब कुछ,कह जाता कैसा,,
तिलिस्म,ये अभिव्यक्ति का।
अद्भुत शब्द संवाद करे,,
कैसे जिस्म व्यक्ति से व्यक्ति का।
22/06/2014    1750 HRS
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