नश्वर नगर का,मैं वासिन्दा हूँ,,
हाँ मैं हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।
दिल है जो,कुलांचे,भर रहा है,,
पर भीतर कुछ, मर रहा है।
लगता है वैसे,भला चंगा हूँ,,
फिर भी,पर क्या,मैं जिन्दा हूँ।
वासनाओं का ही,मैं पतंगा हूँ,,
हाँ मैं हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।
पूजा करके वर,प्रभु से मांगा,,
हसरतों के बस,रथ को हांका।
कर्म रहित रह,भाग्य तलाशा,,
भटक रहा,कर्म वन में प्यासा।
कभी लगता मैं,भिख मंगा हूँ,,
हाँ मैं हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।
गर जिन्दा हूँ तो,जिन्दगी कहाँ है,,
हंसी ढिढोली वो,दिल्लगी कहाँ है।
लगता है जैसे,जिन्दादिल नहीं है,,
पथ बंजर कुछ,हासिल नहीं है।
रंग विहीन हूँ,मैं बेरंगा हूँ,,
हाँ मैं हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।
शब्द नहीं और,कवि बन बैठा,,
खुद से खुद की,छवि बन बैठा।
शिल्प नहीं बस,दिल को गाया,,
वजन ना तोला, छन्द बनाया।
बडे कवियों की,मैं चिन्ता हूँ,,
फिर भी हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।
सर्वाधिकार सुरक्षित@सुजीत शौकीन
मेरा पेज: https://www.facebook.com/pages/Kavi-Sujeet-Shokeen/253451778196049
ब्लाग: http://sujeetshokeen.blogspot.in
फेसबुक: https://www.facebook.com/sujeet.shokeen
हाँ मैं हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।
दिल है जो,कुलांचे,भर रहा है,,
पर भीतर कुछ, मर रहा है।
लगता है वैसे,भला चंगा हूँ,,
फिर भी,पर क्या,मैं जिन्दा हूँ।
वासनाओं का ही,मैं पतंगा हूँ,,
हाँ मैं हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।
पूजा करके वर,प्रभु से मांगा,,
हसरतों के बस,रथ को हांका।
कर्म रहित रह,भाग्य तलाशा,,
भटक रहा,कर्म वन में प्यासा।
कभी लगता मैं,भिख मंगा हूँ,,
हाँ मैं हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।
गर जिन्दा हूँ तो,जिन्दगी कहाँ है,,
हंसी ढिढोली वो,दिल्लगी कहाँ है।
लगता है जैसे,जिन्दादिल नहीं है,,
पथ बंजर कुछ,हासिल नहीं है।
रंग विहीन हूँ,मैं बेरंगा हूँ,,
हाँ मैं हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।
शब्द नहीं और,कवि बन बैठा,,
खुद से खुद की,छवि बन बैठा।
शिल्प नहीं बस,दिल को गाया,,
वजन ना तोला, छन्द बनाया।
बडे कवियों की,मैं चिन्ता हूँ,,
फिर भी हूँ यहाँ,और जिन्दा हूँ।
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